लेखक विनय कोछड़.चंडीगढ़।
देश की स्वतंत्रता में कुछ ऐसे भी सपूत पैदा हुए, शायद, उन्हें भारतीय इतिहास ने अपने पन्नों में जगह देना मुनासिब नहीं समझा। या फिर यूं कह सकते हैं, कि देश की राजनीति ने उनके सम्मान को आगे नहीं बढ़ने दिया। शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर जैसे कई सपूतों को भारतीय इतिहास के पन्नों में जगह मिली। लेकिन, शहीद स्वर्ण सिंह एक ऐसा योद्धा था, जिनके अपनों को आज भी इस बात का इंतजार है कि उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाए या फिर, उनके परिवार को वो सुविधा दी जाए जो अन्य शहीद परिवार को दी जा रही हैं। कुल मिलाकर शहीद स्वर्ण सिंह का परिवार वर्तमान में भी सरकार के उस फैसले का इंतजार कर रहा है कि उन्हें भी अन्य परिवार की भांति सम्मान मिल सकें।
शहीद सरदार स्वर्ण सिंह का जन्म पाकिस्तान पंजाब के लायलपुर (जिला गुजरावालां) के रहने वाले सरदार निहाल सिंह के घर हुआ था। परिवार काफी साधारण कठिन परिश्रमी था। बचपन से ही स्वर्ण सिंह के भीतर कूट-कूटकर देश की स्वतंत्रता के लिए जज्बा भरा था। शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत, उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। परिवार स्वर्ण सिंह के देश-भक्ति पर नाज तो करता था, लेकिन, मन में भय भी सताता था।
स्वर्ण सिंह ने अंग्रेज हुकुमत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए, जगह-जगह जलसे निकालने शुरू कर दिए।अंग्रजों की आंख में शहीद स्वर्ण सिंह तब रड़कने शुरु हो गए, जब उन्होंने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर अदालत में बम फोड़ दिया। बताया जाता है कि इस धमाके में अंग्रेज समझ बैठें की शायद स्वर्ण सिंह मर चुका हैं। उन्होंने स्वर्ण सिंह का शव समझकर , इसे फेंक दिया। लेकिन, उस दौरान स्वर्ण सिंह की सांसे चल रही थी।
बताया जाता है कि इनके अन्य साथी , जल्दबाजी में किसी वाहन का इंतजाम करके अमृतसर के एक सरकारी अस्पताल ले गए। किसी प्रकार से अंग्रेजों को भनक न लगे, इसके लिए कई दिन अपनी पहचान छिपाकर उनके साथ रहकर इलाज कराते रहे। ठीक होने के उपरांत स्वर्ण सिंह पैदल ही जालंधर निकल पड़े। उनके करीबी बताते है कि उन्हें पैदल जालंधर जाने के लिए 2-3 दिन का समय लगा। रास्ते में पेट भरने के लिए वृक्षों के पत्तों को खाया। प्यास बुझाने के लिए कुएं से पानी पीया। आखिरकार , वह दिल्ली की तरफ कूच कर गए। मृत्यु उनकी वर्ष 1996 में टीबी की बीमारी की वजह से हुई।
कई कौमी लहरों में लिया हिस्सा
करीबियों के मुताबिक, शहीद सरदार स्वर्ण सिंह ने कई कौमी लहरों में हिस्सा लिया। बताया जाता है कि शहीद मदन लाल ढींगरा, अमर सिंह, कहर सिंह , सोहन सिंह भकना, सावन सिंह , साधु सिंह , जस्सा सिंह , निरंजन सिंह, राम कुमार , बघेल सिंह कई स्वतंत्रता सेनानी, इनके करीबी साथी थे। बताया जाता है कि देश में आजादी की लहर में यह सभी स्वतंत्रता सेनानी एक-साथ रणनीति तैयार करते थे।
असेम्बली में फोड़ा था बम
बताया जाता है कि शहीद स्वर्ण सिंह ने अपने साथियों सहित लाहौर असेम्बली में बम फोड़ा था। उस दौरान स्वर्ण सिंह खून से लथपथ होकर बेहोश हो गए थे। अंग्रेज समझ बैठे थे कि स्वर्ण मर गया है। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उनके शरीर के ऊपर कई अत्याचार ढाए थे। लेकिन, इनके करीबी साथी, इन्हें इलाज के लिए अमृतसर ले आए। वहां लगभग 1 माह तक इलाज चला। वहां से पैदल जालंधर की तरफ चल पड़े। पेट भरने के लिए सूखे पत्ते खाए, जबकि, प्यास बुझाने के लिए कुंए के पानी का सहारा लिया।
बेटी चल रही बाप के नक्शे कदम पर
शहीद स्वर्ण सिंह की बेटी बाप के नक्शे कदम पर चल रही हैं। वह समाज के दुबले-कुचले लोगों की मदद करती हैं। कई एनजीओ के साथ काम कर रही हैं। बहन जसमीत कौर सराभा हमेशा ही गरीबों की पीड़ा को समझती हैं। इतना ही नहीं, वह अपनी मेहनत से जमा की गई पूंजी का तीसरा हिस्सा, उन लोगों की मदद में खर्च देती है, जिनके पास पैसे की कमी है तथा उन्हें इंसाफ की जरूरत हैं। उन्होंने बताया कि पिता ने उन्हें बचपन में सीख दे दी थी कि हमेशा लोगों की मदद करनी है तथा जिन लोगों को इंसाफ नहीं मिल पाता, उनके साथ सदैव खड़ा रहना है।
5 वर्ष 9 माह काटी जेल
शहीद स्वर्ण सिंह ने 5 वर्ष 9 माह तक अंग्रेजों के समय लाहौर में जेल काटी। बताया जाता है कि पाकिस्तान में प्रत्येक वर्ष एक संस्था , शहीद स्वर्ण सिंह का शहीदी दिवस मनाती हैं, तथा कई प्रकार की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता हैं। लेकिन, दुख की बात है कि इधर की सरकार तथा लोग इस महान सपूत की शहादात को भूल चुके हैं। इतिहास के पन्नों में सिर्फ चंद शहीदों को जगह दी गई, जबकि, इस प्रकार के सपूतों को भूला दिया गया।

आज भी जिंदा है यह पत्र
असेंबली में बम धमाके दौरान, अंग्रेजों ने स्वर्ण सिंह को मृत घोषित कर दिया था। उस वक्त बार एसोसिएशन ने भी इस सपूत को मृत समझ लिया था। इतना ही नहीं, एक पत्र जारी कर, उनकी शहादत को याद भी किया था तथा तीन मिनट का मौन भी रखा था। इस पत्र में लिखी लाइनें वर्तमान में भी जिंदा हैं। यह पत्र उनके परिवार के पास उपस्थित हैं। इस पत्र को देख परिवार के सदस्य पुराने पलों में डूब जाते है।
अंतिम समय आम इंसान की तरह दिल्ली में गुज़ारा
बताया जाता है कि वह एक अंग से दिव्यांग हो गए। अंतिम समय दिल्ली में बड़ी मुश्किलों हालातों में गुज़ारा। परिवार के पालन-पोषण के लिए आर्थिक तौर पर काफी कमजोर हो गए थे। मेहनत-मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण किया। जबकि, देश की स्वतंत्रता उपरांत इस महान सपूत को समय-समय की सरकार भूलती गई। टीबी होने की वजह से वर्ण 1996 में मृत्यु हो गई। परिवार वर्तमान में भी शहीद के दर्जा पाने के लिए सरकारी कार्यालयों में धक्के खा रहा हैं।

