एसएनई नेटवर्क.चंडीगढ़।
जालंधर लोकसभा उपचुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) के उम्मीदवार सुशील रिंकू जीत गए। उन्होंने कांग्रेस के 24 साल पुराने गढ़ को ध्वस्त कर दिया। AAP के आगे अकाली दल-बसपा गठबंधन भी नहीं टिक सका। गुटबाजी में बंटी कांग्रेस की हार के पीछे प्रमुख वजह पार्टी में पड़ी फूट है।
कांग्रेस को उनके ही पूर्व MLA सुशील रिंकू ने AAP से उम्मीदवार बनकर शिकस्त दे दी। रही-सही कसर कांग्रेस हाईकमान ने निकाल दी। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का एक भी चेहरा यहां प्रचार में नजर नहीं आया। अकाली दल और भाजपा एक-दूसरे से गठबंधन तोड़ने के बाद पंजाब में फिर कमजोर नजर आए।
1. पार्टी में बने अलग-अलग गुट
पंजाब में विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार के बावजूद कांग्रेसी सबक लेने को तैयार नहीं है। अभी भी कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है। पंजाब कांग्रेस चीफ अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और नवजोत सिद्धू का अलग गुट चल रहा है। नेता विपक्ष प्रताप सिंह बाजवा अपनी सियासत कर रहे हैं। वहीं पूर्व CM चरणजीत चन्नी अपने हिसाब से पार्टी में काम कर रहे हैं।
2. मिलकर प्रचार नहीं किया
कांग्रेस में गुटबाजी इतनी ज्यादा है कि वह एक-दूसरे को देखने के लिए तक राजी नहीं। यही वजह है कि सिर्फ उम्मीदवार कर्मजीत कौर चौधरी के नामांकन के अलावा सभी किसी एक स्टेज पर नजर नहीं आए। नवजोत सिद्धू अलग प्रचार करते रहे। राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा और चरणजीत चन्नी अलग-अलग उम्मीदवार के लिए वोट मांगते रहे।
3. पार्टी के अंदर की हलचल का पता नहीं
पंजाब कांग्रेस की लीडरशिप को सुशील रिंकू ने सवालों के घेरे में ला दिया है। रिंकू अचानक AAP में शामिल हुए और उनकी टिकट तक पक्की हो गई लेकिन पंजाब के कांग्रेसियों को भनक नहीं लगी। कांग्रेसी सिर्फ इस गलतफहमी में रहे कि जालंधर के लोग 2014 और 2019 की तरह फिर आंखें मूंदकर कांग्रेस को वोट दे देंगे। इसी वजह से रिंकू ने विरोधी पार्टी में जाकर कांग्रेस के किले को ध्वस्त करके रख दिया। इसके अलावा कई कांग्रेसी पार्टी छोड़कर AAP में जाते रहे लेकिन उनका पंजाब नेतृत्व उन्हें रोक नहीं पाया।
4. सरकार न होने से ‘ऑपरेशन चन्नी’ फिर फेल
कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव की तरह यहां भी चन्नी पर दांव खेला। जालंधर के ग्रामीण इलाकों में चन्नी ने खूब प्रचार किया। लोग चन्नी से मिले जरूर लेकिन कांग्रेस को वोट नहीं दिया। हालांकि पिछले विस चुनाव में जरूर चन्नी के बलबूते कांग्रेस जालंधर लोकसभा के अधीन आती 9 में से 5 सीटें जीतने में कामयाब रही लेकिन इस बार लोगों ने उन पर भरोसा नहीं किया। इसकी बड़ी वजह राज्य में कांग्रेस की सरकार न होने को भी माना जा रहा है।

