EDITOR-IN-CHIEF-VINAY KOCHHAR.AMRITSAR/CHANDIGARH.
अंग्रेजों के काल में रखी गई मेडिकल कॉलेज (अमृतसर) की नींव अब कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। क्योंकि, नींव को कमजोर तथा खोखला करने के लिए कॉलेज के प्रिंसिपल बखूबी से उसके प्रति निष्ठा से ड्यूटी निभा रहे हैं। एक गजब के किस्से की वजह से वह काफी सुर्खियां भी बटोर रहे हैं। इतना ही नहीं, कथित अपराधियों के साथ उनका लुका-छिपी का खेल काफी मस्त तरीके से चल रहा हैं। इस खेल का असल किरदार वे खुद निभा रहे हैं। उन्हें (कथित अपराधियों) को वीआईपी ट्रीटमेंट से लेकर हर सुख-सुविधा को दिलाने में अपना हर प्रकार का जोर तथा हथकड़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
चर्चा इस बात की भी हैं, ये सुविधा उनके कथित अपराधी भाई से लेकर एक मंत्री को मिल रही हैं। इतना ही नहीं, इस बात की चर्चा तो सत्ताधारी तथा विपक्ष के गलियारों में भी गूंज रही है। मगर अजीब बात तो यह है कि इसका कोई विरोध भी नहीं कर रहा है। इसके पीछे की असल वजह यह भी है कि इस गुनहगार काम में दोनों ने आपस में हाथ मिला लिया हैं। मामले को कुछ देर के लिए ठंडा रखने के लिए सत्ता के गलियारे से प्रिंसिपल को एक फोन के माध्यम से समझा दिया गया है कि मुद्दा काफी गरमा गया है, इसलिए थोड़ी देर के लिए कानून के दायरे में रहकर काम कीजिए।
अटकलों का बाजार इस बात पर भी गरम है कि मामले को दबाने के लिए कुछ मीडिया घरानों को विज्ञापन देकर उनके मुंह को सील कर दिया गया हैं। इसलिए, मुद्दा काफी ज्वलनशील होने के बावजूद उसकी सुगबुगाहट दूर तक नहीं सुनाई दी।
खैर, सुनने में यह भी आ रहा है कि इस मुद्दे को भुनाने के लिए कुछ संगठन सड़क पर विरोध जताने के लिए आगे निकल चुके हैं। रणनीति से लेकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग को स्वीकृति मिले बिना का एक सुर में फैसला भी हो चुका हैं। मुद्दे की बात यह भी निकल कर आ रही है कि यहां पर प्रिंसिपल साहब की कार्यशैली से कोई भी खुश नहीं हैं। इनका स्वभाव इस बात के लिए जाना जाता है कि जो चापलूसी या फिर रिश्वत का हिस्सा देने में हिस्सेदारी निभाता है, उन्हें वे अपनी गोद में बैठा कर रखते हैं। या फिर यू कहें वे लोग इनके लिए लाहले पुत्र के तौर पर जाने जाते हैं।
बड़ी अजीब बात है कि जो सरकार सत्ता में ईमानदारी का वचन देकर पंजाब में आया थी , वह क्यों शांत होकर बैठी हैं। क्यों, नहीं इतने बड़े मामले को हलके में ले रही हैं। या फिर संकेत दिया जा रहा है कि हम भी आपके बराबर के हिस्सेदार हैं। खैर जनता भी जानती है कि हम बिल्कुल भी बेवकूफ नहीं है। जवाब तो उन्हें भी देना आता है, वह सिर्फ तो सिर्फ इंतजार कर रही है कि आम चुनाव की। क्योंकि, उनका गुस्सा भीतर से यह चीख-चीख कर बता रहा है कि अब हम इस बार पिछली बार की कदापि भूल नहीं करने वाले है। डंके की चोट पर वोट देकर इसकी पाई-पाई का हिसाब लेकर रहेंगे।
…आखिर काम करने वालों को क्यों दिया जाता है दर्द
चर्चा का एक किस्सा और भी काफी सुर्खियां बटोर रहा हैं, वह जुड़ा है , उन ईमानदार, निष्ठा पूर्ण तरीके से ड्यूटी देने वाले डॉक्टर तथा स्टाफ से है, जिनका प्रतिदिन काम है कि कैसे अपने मरीजों की सेवा करना हैं। कैसे उन्हें ठीक करके घर भेजना हैं। लेकिन, अफसोस की बात है कि उन्हें प्रिंसिपल साहब द्वारा प्रतिदिन ऐसा दर्द दिया जा रहा है जो उनके लिए सहन करना काफी मुश्किल हो रहा है। चर्चा, इस बात की भी है कि साहब को दर्द देना काफी अच्छा लगता है। इससे उन्हें सुकून मिलता है। खौफ, उन ईमानदारी डॉक्टर, स्टाफ पर इस कदर बैठ चुका है कि वो अब उन्हें दिन-रात स्वप्न में उनकी तस्वीर नजर आने लग पड़ी है।
ऐसे में साहब को भी समझना होगा कि उनकी भूल काम करने वालों पर कितना दर्दनाक असर डाल रही हैं। बार-बार दर्द देना शायद, आने वाले समय में डॉक्टरों की नींव तथा उनकी निष्ठा को बदल सकती है। खैर, उन्होंने इस बात को बिल्कुल समझा नहीं कि ऐसे में सबसे अधिक प्रभावित मरीज होंगे। क्योंकि, प्रतिदिन की जिल्लत तथा ताने से प्रताड़ित होकर डॉक्टर अपनी नौकरी तक छोड़ने का विचार बना कर बैठे है। ऐसे में एक साहब की गलती से सरकार की राजनीतिक छवि पर भी दाग लगा सकती है। अगर एक बार दाग लग जाए तो शायद उसे मिटाना काफी कठिन हो जाता है।

