भ्रष्ट सिस्टम, दागी खाकीधारी, घोटालेबाज नेताओं, रिश्वतखोर बाबूओ के खिलाफ पत्रकारों की लड़ाई हैं। लेकिन, वैचारिक मतभेद को लेकर हम लोग असल मुद्दों से भटकते जा रहे हैं। ऐसा, इसलिए, क्योंकि हमारी सोच वर्तमान समय में बदल चुकी हैं। हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि हमने भारत जैसे देश की स्वतंत्रता में अहम रोल निभाया। तब ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ पत्रकार समुदाय ने रात भर जागकर लिखा। यही वजह रही, जिससे आम-जनता को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा कर दिया। स्वतंत्रता उपरांत सरकार तथा प्रशासन के बुरे कार्य को समाज के समक्ष उजागर करने में भी पत्रकार शैली ने अहम भूमिका निभाई। कई इस तरह की उदाहरण हैं, जिसने देश-प्रदेश की उन भ्रष्ट ताकतों को सत्ता से पलट दिया, जिसका शायद किसी पार्टी ने कभी अंदाजा ही नहीं लगाया था।
खैर,यहां पर बात काफी गंभीर विषय से जुड़ी है जो है कि हमारे आपसी भाईचारे के वैचारिक मतभेद से, जो कि हमें भीतर ही भीतर खाई जा रहे हैं। ऊपर से गलत विचारधारा हमें इस बात के लिए मजबूर कर रही है कि कैसे हम अपने प्रतिद्वंद्वी पत्रकार को पटखनी दे सकें। आखिर, ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर भी मंथन करना चाहिए, क्योंकि, ये दूरियां कहीं न कहीं हमारे भाईचारा सांझ में काफी दूरियां पैदा कर रही है। जो हमारे समाज के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। कभी हमने शायद ये भी नहीं सोचा कि इन दूरियां का फायदा हमारे समाज को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें ले रही हैं। शायद, हमें ये भी सोचना होगा कि वे ताकत हमें अपने इशारों पर भी नचा रही हैं।
हमसे खफा रहने वाला वर्ग (यानी, भ्रष्ट लाबी) वर्तमान में काफी चढ़ाई कर रहा है। क्योंकि, उन्होंने हमारी नब्ज को टटोल लिया हैं। इसलिए वे लोग बेखौफ होकर गलत काम कर रहे हैं। जिसका कोई विरोध भी नहीं कर रहा है। ऐसा, इसलिए, क्योंकि, हमारा समुदाय ही अलग-अलग गुटों में बट चुका है। अगर हमारा एक वर्ग इनके खिलाफ लिखता या फिर प्रकाशित करता है तो दूसरा गुट उनके बुरे कार्य में बढ़ावा देने के लिए बराबर का सहयोग करता है। ऐसा, इसलिए भी हैं, क्योंकि, वो लोग उनके धन के समक्ष अपना ईमान ही बेच देते है। इसलिए, सम्मान की इच्छा बिल्कुल हमें भूल जानी चाहिए, क्योंकि, कुछ की करतूतों ने अच्छे पत्रकारों की छवि को ही धूमिल कर दिया हैं।
अब अधिकतर समय में ये देखने को मिल रहा है कि पत्रकार वार्ता तो एक मजाक का हिस्सा बन चुका है। खासकर, सत्ताधारी जैसी राजनीतिक पार्टियों की पत्रकार वार्ता, क्योंकि, उसमें सवाल तथा जवाब दोनों ही पार्टियों के होते है, यहाँ तो सिर्फ पत्रकार को अपनी जुबान पर पहले से ही ताला लगाकर बैठा दिया जाता है। अगर कोई पत्रकार सवाल कर ही लेता है तो अन्य पत्रकार ही उसे बैठा लेते हैं, क्योंकि, पहले से ही कुछ पत्रकार लाबी की पार्टियों के साथ पैसों की सेटिंग हो जाती है। भविष्य काल के लिए देखा जाए तो ये पत्रकार शैली के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं हैं। इसका प्रावधान भी होना चाहिए, लेकिन, होना मुश्किल है, क्योंकि, अधिकतर तो पार्टियों के बेहद खास बन चुके हैं। खैर, इस परंपरा को तोड़ना अब कोई आसान काम नहीं रहा हैं।
प्रधान संपादक- विनय कोछड़ की कलम से। (एसएनई न्यूज)

