…..अवैध खनन मामले में पंजाब से मांगा जवाब….

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वरिष्ठ पत्रकार.चंडीगढ़। 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें नदी तल पर अनधिकृत निर्माण और पर्यावरण, पारिस्थितिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर उनके प्रतिकूल प्रभावों को उजागर किया गया है।


सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार राघव द्वारा दायर जनहित याचिका पर प्रतिवादी मंत्रालयों, विभागों/आयोगों/बोर्डों को 3 सप्ताह में जवाब देने को कहा है, जो चाहते हैं कि अदालत सभी नदियों के नदी तल, बाढ़ के मैदान और जलग्रहण क्षेत्रों पर सभी अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण पर प्रतिबंध लगाए।


हिमाचल प्रदेश और पंजाब में अवैध खनन, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन को नदी तल पर अवैध अतिक्रमण से जोड़ने वाली खबरों का हवाला देते हुए राघव ने सभी नदियों, जलमार्गों और जलमार्गों, सहायक नदियों सहित नदी तल, बाढ़ के मैदान और जलग्रहण क्षेत्रों पर सभी अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण को ध्वस्त करने और उन्हें उनके मूल स्वरूप में बहाल करने के निर्देश मांगे हैं।


राघव की ओर से अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने दलील दी कि नदियों और जलमार्गों के बाढ़ के मैदानों और जलग्रहण क्षेत्रों पर अवैध और अनाधिकृत निर्माण/अतिक्रमण की बढ़ती घटनाएं भारत भर में तबाही का सबसे बड़ा कारण बन गई हैं।


पीआईएल में नदी संरक्षण क्षेत्र (आरसीजेड) विनियमन के 2015 के मसौदे को बिना किसी देरी के अधिसूचित करने और सभी नदियों, जलमार्गों और जलमार्गों के बाढ़ के मैदानों का तीन महीने से अधिक समय-सीमा के भीतर सीमांकन करने के निर्देश देने की मांग की गई है। आरआरजेड के मसौदे में नदियों और बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण को रोकने के लिए नदी संरक्षण क्षेत्र (आरसीजेड) स्थापित करने का प्रस्ताव है। नीति आयोग की समग्र जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि भारत अपने इतिहास के सबसे खराब जल संकट से जूझ रहा है।

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