लेखक विनय कोछड़.चंडीगढ़।
सावधान, अगर आपका कल किसी प्रकार से कोई कार्यक्रम पहले से तय है या फिर बना रहे है तो कृपया करके उसे एक दिन के लिए टाल देना ठीक रहेंगा। क्योंकि, किसान संगठन कल यानी 30 दिसंबर सोमवार को पूर्ण पंजाब बंद का ऐलान कर चुके है। रेल यातायात, बस परिवहन से लेकर निजी परिवहन से लेकर सरकारी-निजी प्रतिष्ठान बंद रहेगे। किसानों का समर्थन पंजाब रोडवेज के पनबस संगठन ने भी किया। वे लोग किसानों के साथ धरना स्थल में शामिल होने के लिए रविवार से पहुंच रहे है।
इन लोगों को मिलेगी सिर्फ छूट
किसान संगठन ने इस बात का भी ऐलान किया है कि सिर्फ तो सिर्फ आपातकालीन, शादी कार्यक्रम, हवाई-जहाज से आने वाले यात्री, परीक्षार्थियों को छूट दी गई है। शेष सब कुछ बंद रहने का ऐलान किया गया। पता चला है कि जो लोग किसानों के समर्थन में अपने प्रतिष्ठान बंद नहीं करते है, उन्हें पहले किसानों की टीम प्यार से समझाएंगी, नहीं मानने पर दूसरा अपनाने का प्रावधान भी रखा गया। इस बात की पुष्टि, किसान संगठन ने की।
समझें, क्यों नहीं मान रही सरकार
एक विशेषज्ञ ने बताया कि मानते है कि किसानों की मांगें एकदम जायज है, लेकिन, कुछ मांगे जैसे कि सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण, किसानों की पेंशन सुविधा जैसे कई मांगें है, जिसे किसी भी सरकार के लिए मान लेना इतना आसान नहीं होगा। इसे पूरा करने के लिए सरकार के पास बहुत बजट नहीं है। वैसे, केंद्र सरकार ने बीच का रास्ता अपनाकर किसान संगठनों के साथ बातचीत का दौर आगे बढ़ाने की पेशकश की, लेकिन, किसी कारणवश कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं निकल कर आया।
अन्य पार्टियां कर सियासत
राजनीति से जुड़े एक विशेषज्ञ ने बताया कि अधिकतर राजनीतिक पार्टियां किसानों के मुद्दे को लेकर राजनीति कर रही है। अगर, उन्हें वाक्य ही किसानों के साथ इतनी हमदर्दी है तो यहां-यहां पर इन लोगों का शासन चल रहा है। वहां क्यों नहीं किसानों के लिए कुछ कर देते है। सत्ता में सबसे ज्यादा शासन तो कांग्रेस की सरकार ने किया। आज तक उसने कभी नहीं किसानों की मांग को माना है। सिर्फ तो सिर्फ ये लोग राजनीति की दुकान चला रहे है। और कुछ नहीं उनका कोई लेना देना। प्रदेश की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार है, अगर चाहे तो वह इस समस्या का समाधान झट से सुलझा सकती है। लेकिन, वह ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहती है। क्योंकि, वह भी राजनीति ही कर रहे है।
..ऐसे में कईयों का होगा नुकसान
कई जानकारों का यहीं भी मानना है कि इस बंद में कईयों का नुकसान होगा। खासकर, गरीब वर्ग, मध्यम वर्ग को खासा नुकसान होने लगाया जा रहा है। ये वो वर्ग , जिनकी प्रतिदिन कमाई से अपनी रसोई का गुजारा चलता है। इसमें किसानों को यह सोचना चाहिए था कि मान लिया आपकी मांगें बिल्कुल जायज है, लेकिन, काम करने वालों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए था। अगर छूट मिल जाती तो शायद उनके प्रतिदिन होने वाली आय में कोई फर्क नहीं पड़ता। इस आंदोलन में किसानों का यह भी तर्क है कि उनकी मांगों को लेकर उनके किसान नेता पिछले कई दिनों से आमरण अनशन पर बैठे। केंद्र की सरकार ने अभी तक उनकी भी मांग नहीं मानी है, जोकि एकदम जायज है।
..जानिए, कितने माह से चल रहा है संघर्ष
एक अनुमान के मुताबिक, खनोरी बॉर्डर पर किसानों का पिछले 11 माह से संघर्ष चल रहा है। अगले माह इस संघर्ष को पूरा साल हो जाएगा।रिपोर्ट के मुताबिक, कई बार किसान दिल्ली कूच के लिए आगे बढ़े, लेकिन, हरियाणा पुलिस ने उन्हें हर बार आगे जाने से रोक दिया। उन पर आंसू गैस, पानी की बौछारों से भी पीछे की तरफ धकेला गया। इस बीच एक किसान की मौत तथा कई घायल भी हो चुके है। लेकिन, अभी तक कोई हल नहीं निकल कर आया। उधर, रिपोर्ट सामने आई है कि किसानों ने लुधियाना शहर में ट्रैक्टर मार्च निकाला। उन्हें इसका सभी वर्ग से समर्थन भी मिला। बताया जा रहा है कि यहां के किसान खनोरी बॉर्डर में धरने में शामिल होने के लिए रवाना हुए है।
सुप्रीम कोर्ट का कई बार आया फैसला, नतीजा निकला कुछ नहीं
दरअसल, किसान संगठनों का पूरा मामला देश की सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) देख रही है। उन्होंने इस पर काफी गंभीरता दिखाई। कोर्ट के कहने पर एक समिति गठित हुई। उसमें किसानों की मांगों तथा अब तक की हालात के बारे पता करने के लिए भेजा गया। लेकिन, समिति की रिपोर्ट से यह बात सामने निकल कर आई कि अब तक कोई भी सरकार उचित कदम उठाने में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। पिछले दिनों कोर्ट ने राज्य सरकार को किसान नेता डल्लेवाल की स्वास्थ्य चिंता को गंभीर मानते हुए उन्हें कड़ी फटकार लगाई थी तथा आदेश दिया गया था कि किसान नेता की हालत को गंभीर लिया जाए तथा उपचार बढ़िया तरीके से किया जाए।

