10 हजार प्रतिमाह पगार…..काम पूरे 30 दिन, खाना, रहन-सहन भी खुद का……देखा जाए, यह है एक प्रकार का शोषण
दिनेश कुमार.अमृतसर.चंडीगढ़।
बहादुरी, साहस, निडरता का परिचय देने वाले अमनदीप सिंह, कुलदीप सिंह (अटेंडेंट) ने चाहे पिछले दिनों ट्रेन संख्या नंबर 12204 में सरहिंद रेलवे स्टेशन से गुज़रते समय एक डिब्बा संख्या नंबर ( G20 ) में जब आग लग गई थी, तब उसमें सवार 2 मासूम बच्चों की जान बचाने में अहम रोल निभाया था। लेकिन, बड़े ही ताजूब की बात है कि अब तक रेल विभाग की तरफ से उनकी बहादुरी की प्रशंसा तक नहीं की। पीड़ित यात्रियों से लेकर समाज के हर तपके ने दोनों ही रेल अटेंडेंट की बहादुरी को सलाम किया। सोशल मीडिया में तो उनकी बहादुरी के चर्चे तो देश-विदेश तक मशहूर हो चुके है। हर कोई उनकी बहादुरी की मिसाल दे रहा है। दोनों ने मन में एक बात को सोचा था कि घर में उनके भी छोटे-बच्चे है, इसलिए इन बच्चों की तस्वीर को अपनी आंखों में रखकर जान की परवाह किए बिना उन्हें बचा लिया। 30 मिनट के बचाव में कई मुश्किल पड़ाव आए, लेकिन, हिम्मत की वजह से वे हर पड़ाव को पार करने में कामयाब रहें।
ठीक 6 साल पहले अमृतसर के रहने वाले अमनदीप सिंह, कुलदीप सिंह रेलवे विभाग की एक निजी कंपनी में बतौर अटेंडेंट भर्ती हुए। उनके मुताबिक, भर्ती होने से पहले उनका टेस्ट लिया। जिसे उन्होंने क्लीयर कर लिया। फिर बाद में 15 दिन ट्रेनिंग हुई। कुछ सीखने की निपुणता की वजह से 2 दिन में ही सारा काम सीख लिया। फिर ड्यूटी पर डट गए। उनके मुताबिक, रेल विभाग में भर्ती होना बचपन में ही सपना था। पगार कुछ खास नहीं है। सिर्फ प्रतिमाह 10 हजार मिलता है। घर का खर्च मुश्किल से चलता है। पेट बांधकर भरण पोषण चल रहा है। इतना ही नहीं कोई छुट्टी नहीं है। लगातार तीस दिन ट्रेन में काम करना पड़ता है। कोई खाना पीना नहीं मिलता है। घर से खाना टिफिन में लेकर आते है। भूख लगने पर उसे गर्म कर खाते है।
…जानिए, कैसे हुआ था हादसा..और कैसे बचाई थी जानें
1 हफ्ता पहले अमृतसर रेलवे स्टेशन से गाड़ी संख्या नंबर- 12204 सुबह 4 बजे रवाना होती है। पौने आठ बजे के करीब अटेंडेंट कुलदीप सिंह, अमनदीप सिंह को जी-20 से लोगों की जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई देती है। वो एकदम हैरान रह जाते है कि ट्रेन में क्या हो गया है। ऐसे में यात्री आग लगने की बात को बार-बार दोहराते है। दोनों जांबाज अटेंडेंट ने मुश्किल घड़ी को मात देने के लिए अपना मोर्चा संभाल लिया। बताया जा रहा है कि उस डिब्बे में लगभग सैंकड़ों की संख्या में बुजुर्गों-बच्चे तथा महिला-पुरुष शामिल थे। ऐसे में महिला-पुरुष को पहले बाहर निकाला गया। फिर बच्चों तथा बुजुर्ग, जिनकी कुल संख्या 50 के करीब थी, उन्हें बाहर निकाला गया। बताया जा रहा है कि आग इतनी भयंकर थी कि उसकी लपटें दूर-दूर तक आसमान में दिखाई दे रही थी। ऐसे में यह समय अटेंडेंट के लिए काफी जोखिम भरा था। उन्होंने कंबल की चादर को अपने मुंह में लपेट कर सभी की जान बचाई। इसमें एक महिला आग की चपेट में आई थी। उसका माथा तथा बाजू पर आग लगी थी।
…जानिए, ट्रेन में क्या-क्या हुआ था नुकसान
उस दिन ट्रेन का जी-20 डिब्बा बहुत सारा हिस्सा जलकर राख हुआ था। इतना ही नहीं जी-19 का शौचालय भी राख हो गया था। रेल विभाग ने इस आग को लेकर एक जांच कमेटी गठित की। फिलहाल, उसकी रिपोर्ट आना शेष है। बताया जा रहा है कि उस दिन स्टेशन पर रेल विभाग के उच्च अधिकारी तथा अन्य दल पहुंचा था। उन्होंने अटेंडेंट तथा कुछ यात्रियों से आग लगने पर बयान लिया था। फिलहाल, आग लगने का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाए कि इसके पीछे असल वजह क्या रही।
…..सैल्यूट है 2 अटेंडेंट के जज्बे पर…..?
जिस प्रकार से आग लगने वाले दिन अटेंडेंट अमनदीप सिंह तथा कुलदीप सिंह ने जो जज्बा तथा साहस दिखाया, शायद ही कोई अन्य ऐसा कुछ करने की काबिलियत दिखा पाता। लेकिन, सिर पर कफन, काम करने का जज्बा रखने वाले हर मुश्किल से मुश्किल चुनौती को मात देकर बड़े से बड़े काम को आसानी से कर दिखाते है। उनमें कुलदीप तथा अमनदीप का नाम भी शामिल है। एसएनई न्यूज इन 2 जांबाजों को दिल से सैल्यूट करता है। हम आम जनता से भी अपील करना चाहते है कि अगर आपके सामने भी कभी ऐसी चुनौती आ जाए तो घबराएं मत, बल्कि, उसका डटकर मुकाबला कीजिए।
जनता की अपील…सरकार-विभाग को करना चाहिए, सम्मानित
इस घटना के उपरांत सोशल मीडिया पर एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। लोग सरकार-रेल-विभाग से अपील कर रहे है कि इन 2 जांबाज अटेंडेंट को सम्मानित किया जाना चाहिए। उनके नज़र में वे दोनों ही देश के सच्चे हीरों है। सोशल मीडिया में वायरल हो रही वीडियो बहुत संख्या में लोग शेयर कर रहे हैं। इतना ही नहीं खूब सारे लाइक भी मिल रहे हैं।
किसी सैनिक से कम नहीं ड्यूटी
रेल विभाग में तैनात अटेंडेंट की ड्यूटी किसी सैनिक से कम नहीं होती है। उसे यात्रियों का हर तरह से ध्यान रखना होता है। कंबल देने से लेकर जान को बचाने तक की ड्यूटी भी उसे निभानी पड़ती है। लेकिन, जब पगार की बात करें तो वे इतनी कम मिलती है कि शायद उससे सिर्फ 1 माह में 1 व्यक्ति भी नहीं गुजारा कर पाए। पगार प्रतिमाह 10 हजार निर्धारित की गई। सूत्रों से पता चला है कि असल मुनाफा तो रेल के अधीन कंपनी या ठेकेदार कमा रहे हैं। ड्युटी पूरा माह करनी पड़ती है। बीच में कोई आराम नहीं मिलता है। अगर छुट्टी कर ली तो उसके पैसे पगार से काट लिए जाते है।
….इन जांबाज का घटना के दौरान का अनुभव
साहब, हमारे भी 2 छोटे-छोटे बच्चे है, हमने आग के दौरान 2 मासूम में अपने बच्चों की झलक देखी, फिर क्या था, हमने पहले तकिए की चादर मुंह में लपेटी, लेकिन आग का धुआं तथा उसकी लपटें इतनी भयंकर थी, यह चादर भी एकदम फींकी पड़ गई, फिर दिमाग पर जोर डाला तो नज़र कंबल पर पड़ी तो कंबल की चादर से मुंह लपेटकर बारी-बार कर 2 मासूम को मौत के मुंह से बाहर निकाल दिया। पास में 10-15 बुजुर्ग भी थे, जिनसे बिलकुल चला भी नहीं जा रहा था, उन्हें भी बारी-बारी कर बाहर निकाला गया। आधा घंटा चले इस बचाव कार्य में उन्हें जिंदगी ने वो मुश्किल समय का अहसास करवा दिया। हम भगवान के समक्ष शुक्रिया अदा करते है, जिन्होंने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया।

