कैप्टन के हुए ‘वारे-नवारे, ‘भाजपा-कांग्रेस’ पहुंचे, उनके द्वारे….हर कोई डाल रहे उन पर ‘डोरे’……आखिर, किस के बनेंगे ‘कैप्टन’, राजनीतिक विशलेषण रिपोर्ट में जानेंगे हर वो डिटेल….?

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कैप्टन को कांग्रेस में शामिल होने के ऑफर के बाद भाजपा के संगठन मंत्री  श्रीनिवासुलु ने अस्पताल पहुंचकर उनसे मुलाकात की। - Dainik Bhaskar

कैप्टन को कांग्रेस में शामिल होने के ऑफर के बाद भाजपा के संगठन मंत्री श्रीनिवासुलु ने अस्पताल पहुंचकर उनसे मुलाकात की।

जालंधर में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने जॉइंट डायरेक्टर रवि तिवारी का चेन्नई ट्रांसफर कर दिया है। यह वही IRS ऑफिसर हैं, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके बेटे रणइंदर सिंह को विदेशों में संपत्ति के मामले में समन जारी किया था और आज (13 फरवरी) को पेश होने के लिए कहा था।

वहीं 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को पूर्व CM कैप्टन अमरिंदर सिंह की याद आ गई है। पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल ने गुरूवार को कहा कि कैप्टन अगर कांग्रेस में आना चाहें तो हाईकमान विचार कर सकता है। बघेल के इस बयान से एक तरफ राजनीतिक गलियारों में हलचल हो गई तो दूसरी तरफ कांग्रेस में CM कुर्सी पर नजरें टिकाए बैठे सीनियर लीडरशिप में हड़कंप मच गया।

कांग्रेस के कैप्टन पर डोरे डालने की बड़ी वजह पार्टी में चुनाव से पहले चल रही गुटबाजी है। जिसमें कोई भी एक-दूसरे के अंडर काम करने को तैयार नहीं। राहुल गांधी की चेतावनी के बाद भी किसी पर फर्क नहीं पड़ा। वहीं कांग्रेस ये भी जानती है कि पंजाब में जब बादलों का गोल्डन टाइम चल रहा था तो उसका तोड़ कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ही निकाला और 2 बार कांग्रेस की सरकार बनाई। हालांकि कैप्टन की बेटी व पंजाब भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष जय इंदर कौर ने कल ही लुधियाना में कहा कि कैप्टन कहीं नहीं जा रहे हैं। वो भाजपा में हैं और भाजपा में ही रहेंगे।

ऐसी कौन सी वजहें, जिनसे कांग्रेस को कैप्टन की याद आई, क्या कैप्टन कांग्रेस जॉइन करेंगे, कैप्टन के आने से कांग्रेस में क्या असर पड़ेगा, जानने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

कैप्टन को कांग्रेस का न्योता ऐसे टाइम पर आया है, जब वह घुटनों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हैं। वहीं इसके बाद खबर सामने आई कि ED ने उन्हें व उनके बेटे को पूछताछ के लिए समन जारी किया है। फोटो में हरियाणा के मंत्री अनिल विज उनसे मुलाकात कर रहे हैं।

कैप्टन को कांग्रेस का न्योता ऐसे टाइम पर आया है, जब वह घुटनों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हैं। वहीं इसके बाद खबर सामने आई कि ED ने उन्हें व उनके बेटे को पूछताछ के लिए समन जारी किया है। फोटो में हरियाणा के मंत्री अनिल विज उनसे मुलाकात कर रहे हैं। कैप्टन की अगुआई में कांग्रेस ने पंजाब में 2017 में 117 में से 77 सीटें जीतीं और सरकार बनाई। कैप्टन ही मुख्यमंत्री भी बने। हालांकि कैप्टन ने पंजाब में अपने स्टाइल में सरकार चलाई। वह हाईकमान कल्चर को ज्यादा तरजीह नहीं देते थे। इसके चलते कांग्रेस हाईकमान उनसे खुश नहीं था।

इसी वजह से कांग्रेस के कैप्टन विरोधी खेमे ने साल 2021 में नवजोत सिद्धू को एक्टिव किया। हाईकमान तक पैरवी कर सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का प्रधान बना दिया। सिद्धू ने कैप्टन के खिलाफ बगावत का मोर्चा खोल दिया। कैप्टन को बिना बताए हाईकमान ने विधायक दल की मीटिंग बुलाई। इसका पता चलते ही कैप्टन ने इस्तीफा देकर कांग्रेस छोड़ दी। कैप्टन ने इसे कांग्रेस की गलती करार दिया था कि पार्टी उनकी अगुआई में आराम से सरकार बना सकती थी।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 18 सितंबर 2021 को इस्तीफा दिया था।- फाइल फोटो

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 18 सितंबर 2021 को इस्तीफा दिया था।- फाइल फोटो

कैप्टन के जाने से कांग्रेस को क्या नुकसान हुआ, 5 पॉइंट में जानिए…

  • कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को 2022 के चुनाव से 3 महीने पहले CM कुर्सी से हटा दिया था। जिसके बाद कांग्रेस ने दलित नेता चरणजीत चन्नी को CM बनाया। नवजोत सिद्धू को नजरअंदाज कर चन्नी की अगुआई में चुनाव लड़ा। कांग्रेस हाईकमान इसे मास्टरस्ट्रोक समझता रहा लेकिन पंजाबियों ने उनके दावे की हवा निकाल दी। 92 सीटें जीतने वाली AAP की आंधी में कांग्रेस 117 में से 18 सीटें ही जीत सकी।
  • कैप्टन के इस्तीफे के बाद पार्टी लीडरशिप में बिखराव आ गया। नवजोत सिद्धू एक्टिव पॉलिटिक्स से दूर हो गए। पूर्व सीएम चरणजीत चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग के बीच तनातनी हो गई। कई बड़े नेता राजा वड़िंग की अगुआई में काम करने को राजी नहीं हैं। नवजोत कौर सिद्धू ने तो वड़िंग को प्रधान मानने से इनकार करते हुए चुनाव से पहले पार्टी छोड़ दी।
  • कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जिनकी हर वर्ग के वोटरों में साख है। माझा, मालवा और दोआबा के मुद्दों की समझ के साथ लोगों को एकजुट करने में कैप्टन राजनीतिक महिर रहे हैं। उनके जाने के बाद कांग्रेस के पास ऐसा कोई विश्वसनीय बड़ा चेहरा नहीं बचा जो हिंदू और सिख दोनों समुदायों को बराबर लेकर चल सके।
  •  कैप्टन के साथ-साथ उनके कई वफादार नेता और कार्यकर्ता भी पार्टी से अलग हो गए। इससे ग्रासरूट पर कांग्रेस का कैडर कमजोर हुआ और पुराने पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगी। कैप्टन का पंजाब के जट्ट सिख वोटर में सीधा प्रभाव रहा है। पंजाब की कुल जनसंख्या में जट्ट सिखों की आबादी लगभग 21 फीसदी के लगभग है। पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से लगभग 80-85 सीटों पर जट्ट सिख मतदाता हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
  • रिटायर फौजी और पटियाला के राजघराने से नाता होने के चलते कैप्टन को बतौर महाराजा भी सम्मान मिलता है। रिटायर्ड फौजी होने की वजह से उनकी सिक्योरिटी पर पूरी पकड़ थी। कैप्टन का कद नेशनल लेवल के लीडर का है। वह मुद्दे उठाते थे तो उसकी गूंज दिल्ली तक जाती थी। अब जिन नेताओं को अगुआई सौंपी गई, वह इतने दमदार तरीके से AAP को नहीं घेर पाए।

पंजाब इंचार्ज का कैप्टन को न्योता इतना महत्वपूर्ण क्यों..?

  • छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल कांग्रेस को चुनावों में जीत दिलाने के रणनीतिकार हैं। पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव में चीफ आब्जर्वर रहे बघेल पंजाब की समझ रखते हैं। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बघेल पार्टी को मजबूत करने सहित नेताओं की नाराजगी दूर करने में भूमिका निभा चुके हैं। बघेल कैप्टन के भी नजदीकी माने जाते हैं।
  • साल 2021 में जब पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू और बाद में चरणजीत सिंह चन्नी के बीच कलह चल रही थी, तब भूपेश बघेल को विवाद सुलझाने के लिए चंडीगढ़ भेजा गया था। उन्होंने पार्टी के विभिन्न गुटों के बीच तालमेल बैठाने और कलह को कम करने की कोशिश की थी।
छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम जिन्होंने कैप्टन के लौटने पर विचार करने की बात कही।

छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम जिन्होंने कैप्टन के लौटने पर विचार करने की बात कही।

पंजाब की सियासत में कैप्टन की भूमिका कितनी अहम…

  • पंजाब में 2002 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में लड़ा और 117 विधानसभा सीटों में से 62 पर जीत दर्ज की। उस समय कैप्टन की लोकप्रियता चरम पर थी और बतौर CM उनके 2002 से 2007 के कार्यकाल को लोग आज भी याद करते हैं। हालांकि सरकार के आखिरी साल में पंजाब में सिटी सेंटर घोटाला उजागर हुआ और कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान देश में नरेंद्र मोदी की लहर चल रही थी। पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार थी। अकाली दल के आग्रह पर भाजपा ने अमृतसर से अपने मौजूदा सांसद नवजोत सिद्धू का टिकट काटकर अरुण जेटली को मैदान में उतारा। उस समय कांग्रेस के पास जेटली के सामने कोई दमदार चेहरा नहीं था, इसलिए सोनिया गांधी ने अंतिम समय में कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनाव लड़ने को कहा। कैप्टन ने सोनिया गांधी के आदेश पर न सिर्फ चुनाव लड़ा बल्कि अरुण जेटली को एक लाख से अधिक वोटों से शिकस्त भी दी।
  • पंजाब में 2007 से 2017 तक अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने 10 साल सरकार चलाई। कांग्रेस पंजाब में सरकार बनाने का पूरा जोर लगा रही थी। तब 2017 के विधानसभा चुनाव से साल भर पहले कैप्टन ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग की। बदले में सरकार बनाने का भरोसा दिया। कांग्रेस हाईकमान ने प्रताप बाजवा को हटाकर कैप्टन को प्रधान बनाया। जिसके बाद कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटें जीत लीं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह सोनिया गांधी के करीबी थे।

कैप्टन अमरिंदर सिंह सोनिया गांधी के करीबी थे।

सोनिया के कहने पर पहले भी कांग्रेस में आ चुके

  • कैप्टन ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी। पूर्व PM स्व. राजीव गांधी उन्हें सियासत में लाए थे। 1980 में वे पहली बार कांग्रेस की टिकट पर पटियाला से लोकसभा सांसद चुने गए। मगर, 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। लोकसभा से भी इस्तीफा दे दिया और अकाली दल में शामिल हो गए। कैप्टन अकाली दल की टिकट पर बठिंडा की तलवंडी साबो विधानसभा सीट से 2 बार विधायक चुने गए। तत्कालीन अकाली दल की सरकार में कैप्टन मंत्री बने और एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट और पंचायतीराज मंत्रालय संभाला।
  • 1992 में कैप्टन ने शिरोमणि अकाली दल से डकाला विधानसभा सीट मांगी, मगर पार्टी ने वहां से गुरचरण सिंह टोहड़ा के दामाद हरमेल सिंह टोहड़ा को टिकट दे दिया। इसके बाद कैप्टन ने तलवंडी साबो सीट मांगी जहां से वह 2 बार विधायक बन चुके थे, मगर पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के दबाव में उन्हें वो सीट भी नहीं दी गई। दरअसल बादल नहीं चाहते थे कि कैप्टन मजबूत हों।
  • अकाली दल से टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर कैप्टन ने शिरोमणि अकाली दल छोड़कर 1992 में अकाली दल पंथक नाम से नई पार्टी बना ली। 1998 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन की पार्टी कुछ खास नहीं कर सकी और खुद कैप्टन को उनकी सीट से महज 856 वोट मिले। 1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली, जिनसे कैप्टन परिवार के अच्छे संबंध थे। सोनिया के आग्रह पर कैप्टन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और 1999 में कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब में कांग्रेस का प्रधान बना दिया। फिर 2002 में कैप्टन कांग्रेस को सत्ता में लाए।

कैप्टन ने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि आज भी उनके कांग्रेस हाईकमान से अच्छे रिश्ते हैं। कांग्रेस एक फैमिली की तरह है। मैं जब भी फोन करता था, वह मिल लेते थे। मगर, भाजपा में ये सिस्टम नहीं है। दोनों में कई अंतर हैं। कैप्टन ने आगे कहा था- जब से मैं BJP में आया हूं, मुझे नहीं लगता एक-दो बार से ज्यादा बार हाईकमान से मिल पाया हूं।

BJP में नियम बहुत हैं। वो कुछ नहीं बताते। किसी से कुछ नहीं पूछते। अभी 2027 में पंजाब का इलेक्शन होना है। मगर मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया कि कैप्टन साहब किस को कहां से चुनाव लड़वाया जा सकता। मैं BJP में हूं लेकिन कांग्रेस को मिस करता हूं। पंजाब में कांग्रेस लीडरशिप की इगो से जूझ रही है। सभी नेता खुद को एक-दूसरे से बड़े कद का समझ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस वर्कर ग्राउंड लेवल पर खुद को लीडरलैस महसूस कर रहे हैं। उन्हें ये समझ नहीं आ रहा कि किसकी अगुआई पर चलना है। एक के साथ चलो तो दूसरा नाराज हो जाता है।

कैप्टन चूंकि पहले भी 2 बार पार्टी प्रधान रह चुके हैं तो वह अगुआई के लिए बेस्ट फेस साबित हो सकते है। दूसरा, कैप्टन ही अकालियों के दबदबे के टाइम में कांग्रेस की सरकार बनाने में कामयाब रहे थे। ऐसे में कांग्रेस सोच रही है कि कैप्टन वह करिश्मा दोबारा कर सकते हैं। कैप्टन के आने से पिछली बार बदलाव के बहाने AAP के हक में शिफ्ट हुए जट्‌ट सिख वोट बैंक को कांग्रेस की तरफ झुका सकते हैं। खासकर, 117 में से सबसे ज्यादा 69 सीटों वाले मालवा में कांग्रेस को बेनिफिट हो सकता है। पंजाब में इस वक्त लॉ एंड ऑर्डर को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। कैप्टन के समय में लॉ एंड ऑर्डर को लेकर सख्ती को विरोधी भी मानते हैं।

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