यहां पर दुकानदारों का चलता है पूरा-पूरा डंका…..राजनीति की है पूरी शह….निगम अधिकारी के अधिकारी है सब बेबस…..।
मुकेश बावा.अमृतसर।

शहर के बीचों बीच इस बाजार को लोगों की सुविधा के लिए अंग्रेजों के शासनकाल में आज से 200 साल पहले बसाया गया। इस बाजार को पुतलीघर के नाम से जाना जाता है। लेकिन, इन दिनों यहां का मेन बाजार, शिमला मार्किट, न्यू शॉपिंग मार्केट ( गोल मार्केट ) के दुकानदारों की तरफ से अतिक्रमण किया गया है। यह अतिक्रमण 2 किलोमीटर तक है। इतना ही नहीं, इन्हें यहां के 2 कांग्रेसी पार्षदों का पूरा पूरा सहयोग मिल रहा है, इसलिए, यहां पर नगर-निगम भी कोई कार्रवाई करने से डरती है। बताया जाता है कि यहां पर अतिक्रमण करने वाले दुकानदारों ने 7 फीट तक अपना रौब पूरी तरह से जमा रखा है।
राहगीर, दो पहिया वाहन चालक का तो निकलना एकदम मुश्किल हो जाता है। अगर कोई इनके खिलाफ बोलता है तो उसकी जुबान को ही खींच लिया जाता है। पिछले समय यह भी इस बाजार में चर्चा रही कि कोई पत्रकार जहां पर कवरेज करने के लिए गया तो सभी दुकानदारों ने उसके खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर वहां से भागा। कहने का भाव है यहां के दुकानदारों की गुंडई पूरी तरह से चलती है। उधर, कुछ नियमों का पालन करने वाले लोगों ने हाथ जोड़ कर निगम तथा सरकार से मांग की कि इस प्रकार के अतिक्रमण को हटाया जाए, वे लोग इस कार्य में प्रशासन तथा सरकार का सहयोग करेंगे।
प्रशासन पर राजनीति हावी
पूरी जांच पड़ताल करने के उपरांत पता चला है कि यहां पर अतिक्रमण के पीछे राजनीति बहुत हावी है। 2 कांग्रेसी पार्षदों का इस अतिक्रमण करने वाली मार्केट के सिर पर हाथ है, अगर कोई निगम प्रशासन की तरफ से अतिक्रमण हटाने के लिए आ जाता है तो दोनों पार्षद निगम के अधिकारियों के समक्ष उलझ जाते है, उनके सरकारी कार्य में विघ्न डाल देते है। इसमें एक पार्षद का नाम तो कई बार उछला है,उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले भी दर्ज है। कहा जाता है कि यहां पर प्रशासन पर राजनीति खूब हावी है। पहले कांग्रेस पार्टी का गढ़ माना जाता रहा है, अब आम आदमी पार्टी (आप) विधायक के दुकानदार लाडले बन चुके है, इसलिए, नेता जी पहले ही इनके अध्यक्ष को फोन कर देते है कि अतिक्रमण हटा लो, अन्यथा निगम की कार्रवाई हो जाएगी। इससे नेता जी की सरकार तथा प्रशासन दोनों में ही साख बची रहती है।
बड़ा सवाल….कितना जायज है 7 फीट तक अतिक्रमण
जांच पड़ताल में सामने आया कि दुकानदारों ने 7 फीट तक अतिक्रमण कर रखा है। अपनी दुकान के आगे छोटे-छोटे अड्डे बनाकर किसी अन्य को किराए पर दे रखे है। पता चला है कि यहीं दुकानदार उनसे प्रतिदिन हजार रुपए चार्ज करते है। मतलब जगह सरकार की, फायदा दुकानदार ले रहे है। प्रतिमाह उनकी तीस हजार रुपए अलग आय पैदा हो रही है। बाजार में एक जगह नहीं, बल्कि, 1 हजार ऐसे ही अड्डे चल रहे है। इससे सरकार प्रशासन की आय को करोड़ों के हिसाब से चूना लग रहा है। इस काम में सरकार तथा कुछ अधिकारियों की एक श्रेणी चंद पैसों की खातिर गलत लोगों का साथ दे रही है।

जाम के पीछे अतिक्रमण
कुछ दुकानदारों का साफ तौर पर कहना था कि वे लोग अतिक्रमण के खिलाफ है। पर क्या करें, अगर हम लोग अतिक्रमण नहीं करते है तो अन्य दुकानदार उनकी दुकान के आगे अतिक्रमण कर लेते है। इसके बारे नगर-निगम को कई बार शिकायत कर चुके है, लेकिन कोई समाधान आज तक नहीं निकला। फिर भी इस अतिक्रमण के खिलाफ निगम को बड़ा फैसला लेना चाहिए। बड़ी कार्रवाई करेंगे तो सब सुधर जाएंगे। यहां पर लगने वाला जाम का प्रमुख कारण भी अतिक्रमण ही है। जाम लगभग 2-3 किलोमीटर प्रतिदिन लग जाता है। ट्रैफिक पुलिस कोई कार्रवाई करने लगती है तो दुकानदारों का एक समूह उनके खिलाफ रोष करने लग पड़ता है। मजबूरीवश पुलिस को अपनी कार्रवाई से पीछे हटना पड़ता है।

…..यह वो महत्वपूर्ण कदम..जिसे प्रशासन तथा निगम को उठाना बहुत आवश्यक
1) सबसे पहले यहां पर अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार को निगम को फ्री हैंड करना चाहिए। सरकार के भीतर किसी नेता या मंत्री का किसी प्रकार से कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। कार्रवाई करने वाली एक ईमानदार अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम होनी चाहिए जो कानून के खिलाफ जाने वालों पर कार्रवाई करने से बिल्कुल डरे नहीं।
2) कार्रवाई करने से पहले किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए, पुलिस तथा निगम टीम के बीच अच्छा तालमेल होना चाहिए। अगर ऐसा संभव हो जाता है तो समझ लीजिए, पुराने अतिक्रमण की परंपरा को तोड़ने में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
3) अतिक्रमण हटाने वाली टीम के समक्ष कोई नेता या फिर इनका चहेता आ भी जाए तो टीम में इतना हौसला होना चाहिए कि वह इनके खिलाफ कार्रवाई करने में बिल्कुल झिझके नहीं। इन सबके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के तहत बड़ी धारा लगा देनी चाहिए, ताकि, ये लोग भविष्य में भी झूठ का साथ देने के बारे कभी सोचने का विचार भी नहीं करें।
4) बड़े अधिकारियों तथा कर्मचारियों की रिपोर्ट के बारे पल-पल एक-दूसरे तक पता होना चाहिए। अधिकारी आगे चंडीगढ़ मुख्यालय तक इस रिपोर्ट को लगातार भेजता रहे, ताकि, सरकार को भी पता लग जाए कि शहर में क्या कुछ हो रहा है तथा उनके नेता क्या कुछ कर रहे है। इससे एक बात का तो यह फायदा होगा कि सरकार को अपने चहेते नेताओं की काली करतूतों का चिट्ठा पता लग जाएगा कि वे लोग कितने पानी में है।
5) निगम को भी पूरे मापदंड के साथ उतरना होगा। उसे किसी की परवाह नहीं करनी होगी। उन्हें इस बात का पता होना चाहिए कि वह सरकारी अधिकारी है तथा उनका काम है कि जनता की सेवा करना। अगर किसी नागरिक को अतिक्रमण की असुविधा हो रही है तो तत्काल उस बुराई को जड़ उखाड़ने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अगर वे लोग ईमानदारी से काम कर लेते है तो आम जनता का ये लोग दिल जीत लेते है। लेकिन, ऐसा होना संभव नहीं है, क्योंकि, भ्रष्टाचारी तथा रिश्वतखोरी ने कई बाबूओं तथा कर्मचारियों के ईमान को बेच कर रख दिया है।
निगम के एक अधिकारी का तर्क
इस मामले में हम कुछ नहीं कर सकते है। अगर कार्रवाई के लिए मैदान में निकलते है तो उन्हें राजनीतिक लोग फोन कर वापस जाने के लिए बोल देते है। हम जानते है कि पुतलीघर में अतिक्रमण की बहुत बड़ी समस्या है, लेकिन, हमारे हाथ चारों तरफ से बंधे है, इसलिए कार्रवाई के लिए जाते भी है तो पहले ही अतिक्रमणकारियों को फोन के माध्यम से संकेत चला जाता है कि आज टीम आने वाली है। सब कुछ बाहर से उठा लिया जाता है।

