SNE-NEWS-SPECIAL-REPORT…बड़े-बड़े विज्ञापन बोर्ड….शिक्षा के नाम पर सरासर ‘झूठ का ‘पुलिंदा’

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एडिटर-इन-चीफ.विनय कोछड़.अमृतसर/CHANDIGARH। 

शिक्षा के नाम पर विज्ञापन के बड़े-बड़े बोर्ड, मंत्रियों-राजनीतिज्ञों की तस्वीरें, विदेशी डेलिगेट का प्रचार, इस बात की ओर इशारा  करता है कि ये  एक प्रकार से शिक्षा के नाम पर झूठ का पुलिंदा हैं। बच्चे को शिक्षा दिलाना हर वो मां-बाप का स्वप्न होता है, जिसने अपनी अंखियों में सजा कर रखा होता हैं। वर्तमान समय में हालात ऐसे है कि महंगी शिक्षा 70 फीसद अभिभावकों के लिए विलंबना पैदा कर रही हैं। खैर, जो शिक्षा के नाम पर लाखों-करोड़ों की कमाई कर रहे हैं, उन पर अंकुश लगाना काफी लाजमी हो चुका है। लेकिन, ऐसा होना इतना आसान तथा संभव नहीं हैं, क्योंकि, उन पर है बड़े-बड़े लोगों का हाथ, जिनकी छत्रछाया के नीचे वे लोग (शिक्षण-संस्थान संचालक) लूट मचा रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इनके खिलाफ अगर कोई अभिभावक मोर्चा खोलने के लिए तैयार होता भी है तो वे (शिक्षण-संस्थान) विद्यार्थी की छवि पर ही दाग लगा देते हैं। ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार हो चुका हैं। ऐसे में आवाज उठाने वाले के पास एकमात्र रास्ता ही खामोश होना शेष बचता हैं। 

ऐसे में राज्य सरकार को कोसना कोई गलत नहीं होगा। क्योंकि, उनकी खराब नीतियों की वजह से निजी शिक्षा में सरेआम लूट मच रही हैं। निजी शिक्षण संस्थान के हालात तो ऐसे है कि जो उन्होंने नियम कानून लागू कर दिया, उसे हर अभिभावक को मानना ही पड़ेगा। चाहे वो संविधान या फिर कानून के खिलाफ क्यों न हों। सरकारी तंत्र की बात कीजिए तो उसमें शिक्षा विभाग ने तो निजी क्षेत्र के आगे पहले से ही  घुटने टेक दिए हैं। ऐसा, इसलिए भी माना जा रहा है कि क्योंकि, विश्वसनीय सूत्र  बतातें है कि उनकी और  शिक्षा-विभाग में सच्ची दोस्ती का मापदंड चल रहा है। दोनों ही एक-दूसरे की हर जरूरत को समय-समय पर पूरा कर रहे हैं। 

अब सवाल यह भी खड़ा होता है कि सरकार इसमें क्या रोल निभा रही है। प्रदेश की ईमानदारी सरकार ने तो सत्ता में आते ही आम जनता से वादा किया था कि वह निजी शिक्षा को न तो महंगा होने देंगे अथवा नहीं उनकी मनमानियां चलने देगे। तब एक समिति भी गठित हुई, लेकिन, अब तक यह पता नहीं चला कितनों पर कार्रवाई हुई या फिर इन्होंने कुछ किया ही नहीं हुआ। ऐसे में सरकार पर भी सवाल उठना काफी लाजमी हो जाता है, क्योंकि, सरकार को भी इन लुटेरों की सूची में  गिना जा रहा हैं।   

..हम आपको समझाएंगे , कैसे, शिक्षा के नाम पर चल रही लूट

सबसे पहले विद्यार्थी के दाखिला समय सीट का मूल्य हजारों-लाखों लगाया जाता हैं। 

दाखिला के बाद कई प्रकार अन्य सुविधाओं के तौर पर अलग-अलग पैसे (फंड) जोड़े जाते है, जो कि कुल मिलाकर लाखों रुपए तक पहुंच जाते हैं।   

इतना ही नहीं, किताबें, स्कूल वर्दी भी स्कूल के ही दुकानदार से उन्हें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। जो कि मनमाने दाम वसूल कर पूरी तरह से लूट मचाते हैं। 

हैरान करने वाली बात है कि अगर बच्चे ने स्कूल में गेम रखनी है तो उसके लिए प्रतिमाह अलग से फीस निर्धारित की जाती हैं। जो कि आम अभिभावक के लिए पैसे निकालना इतना आसान नहीं हैं। 

….जानेंगे, कैसे जलील किया जाता है अभिभावक व उनके बच्चों को

मान लीजिए, अगर आप फीस देने में थोड़ी देर करते है तो टीचर बच्चे को सभी बच्चों को जलील करता है। उन्हें कई प्रकार के ताने दिए जाते है। इतना ही नहीं, अभिभावकों को फोन के माध्यम से खरी खोटी सुनाई जाती हैं। जब बच्चे को कक्षा में सब के सामने बेइज्जत किया जाता है तो वे मन को लगा लेते हैं। ऐसे में बच्चा कई बार गलत कदम भी उठा लेता है। जिसके बारे शायद किसी ने सोचा भी नहीं होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में एक चिंता का शोध सामने आया है कि सबसे अधिक संख्या में बच्चे आत्मदाह के रास्ते की तरफ चल रहे हैं। जो एक प्रकार से समाज को इस बात के लिए सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि हमारा आने वाला भविष्य किस राह पर चल रहा हैं। 

अभी तक शीर्ष अदालत या फिर सरकार के आदेश हो रहे दरकिनार

शीर्ष अदालत या फिर सरकार ने कई अहम फैसले निजी शिक्षा पर पारित किए हैं, जिसे अभी तक किसी निजी शिक्षण संस्थान ने लागू तक नहीं किया। इतना ही नहीं, उसे सरेआम दरकिनार करने के कई केस भी सामने आ रहे है। जिसे इन लुटेरा शिक्षण संस्थान द्वारा दबाया जा रहा हैं। शीर्ष अदालत के फैसले के मुताबिक, गरीब पढ़ने वाले निजी शिक्षण संस्थान में निशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान रखा हैं। इतना ही नहीं, शिक्षा तथा खेल में स्कूल तथा देश का नाम रोशन करने वालों को वजीफा देने का प्रावधान भी पारित है, लेकिन, ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा है। बताया जाता है इस प्रकार के केस में निजी शिक्षण संस्थान उन बच्चों को कुछ भी देने से साफ इंकार कर देते हैं। 

बड़ा सवाल…कैसे , इनकी लूट पर लगेगी रोक

ऐसे में सरकार तो सिर्फ 5 साल के लिए आती हैं। हर पार्टी सरकार में आने से पूर्व जनता से शिक्षा-स्वास्थ्य के नाम का इस्तेमाल कर भोली भाली जनता को अपने जाल में फंसा लेती है। अगर, जनता भी निजी शिक्षा को लेकर अपना स्टैंड स्पष्ट कर दें तो समझ लीजिए हर राजनीति पार्टी के कान खड़े हो जाएंगे कि अब वो पुरानी जनता नहीं है कि जिसे समझा बुझाकर वोट हासिल कर लिया। अब जनता को चाहिए आगे आकर अपने मुद्दे जैसा महंगी शिक्षा नीति के खिलाफ अपना स्टैंड लेना होगा। जो प्रतिनिधि आने वाले चुनाव मांगने आता है तो उससे पहले शिक्षा के ऊपर उनकी पार्टी की क्या नीति हैं, उस पर अवश्य सवाल खड़ा करें, जो पार्टी पक्के तौर पर महंगी शिक्षा नीति के बदलाव पर स्टैंड लेती है , उसे ही अपना मत देकर अपने वोट की ताकत दिखाए। फिर जाकर हम समझ सकते है कि महंगी शिक्षा लूट पर रोक लग सकती हैं।  

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