एडिटर-इऩ-चीफ.विनय कोछड़.अमृतसर।
इस बार प्रेस क्लब अमृतसर के चुनाव काफी रोमांचक होने जा रहे हैं। ऐसा , इसलिए भी माना जा रहा है , क्योंकि, हार-जीत का फैसला सोशल मीडिया से जुड़े यूट्टूबर-पोर्टल के हाथ में माना जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि 70 फीसद इस क्षेत्र से जुड़े पत्रकार इन चुनावी मुकाबलों की नतीजों में काफी अंतर के साथ उल्टफेर भी कर सकते हैं। लेकिन, विडंबना इस बात की है कि कुछ लोग चाहते ही नहीं है कि उन्हें इस मुकाबले में मताधिकार हासिल हो सकें। ऐसे में वे लोग सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकारों के खिलाफ एक गंदी रणनीति तैयार करने जा रहे हैं। लेकिन, उनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए शहीद भगत सिंह प्रेस जर्नलिस्ट एसोसिएशन (रजि.) ने पूरी योजना तैयार कर ली। चेतावनी देते अध्यक्ष रंजीत मसोन ने कहा कि अग इस बार सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकारों के वोट नहीं बनें तो फिर भूख हड़ताल की जाएगी।
जब से प्रेस क्लब चुनाव अमृतसर की तारीख घोषित की गई, तब से पत्रकारों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा हैं। ऐसा , इसलिए खास माना जा रहा है कि क्योंकि, इस बार चुनाव में बाबा बोहड़ के तरफ लहर काफी तेजी से चल रही हैं। चिर प्रतिद्वद्वी खेमे में इस समय निराशा ही दिखाई दे रही हैं। माना जा रहा है कि उक्त खेमा काफी मायूस ओर अकेलापन महसूस कर रहा है, ऐसा, इसलिए, क्योंकि उनके अपने ही बैगाने हो चुके है। इस बार पट्टी साहब के लिए खुशी की बात तो यह भी है कि उनके समर्थन में कई यूनियन खड़ी हो चुकी है तथा चुनाव में पूरा सहयोग देने का भी वादा कर चुकी है। ऐसे में सवाल एक यह भी है कि पट्टी साहब को समर्थन देने वाली यूनियन के पद्दाधिकारियों का भी साथ देना होगा। क्योंकि, उनकी जीत में ये लोग खासा काम कर सकते हैं।
इधर, सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकार लंबे समय से अपने वंचित अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। उनके लिए तो कभी किसी प्रेस क्लब ने अपनी आवाज तक कायम नहीं की। उल्टा, उनके खिलाफ हमेशा ही गलत बयान देने का भी आरोप लगता रहा। लेकिन, शायद उन्हें मालूम नहीं है कि इस बार की हार-जीत का फैसला तो सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकारों के हाथ में हैं। माना जा रहा है कि उनके मत ही इस बार के प्रधान के भविष्य का फैसला करने जा रहे है। एक बात तो साफ है कि पट्टी साहब , इस बात को मान कर चल रहे है कि उक्त पत्रकार उनकी बड़ी जीत का रास्ता बना सकते हैं, इसलिए, उन्होंने सीएम से मुलाकात कर उनके हक की भी प्राथमिकता से आवाज उठाई। खैर, अंदर की बात तो यह है कि प्रतिद्वद्वी ग्रुप को यह बात भीतर ही भीतर खा रही हैं, इसलिए, उनकी रात की नीदें हराम होती नजर आ रही हैं।
बड़ा सवाल…..क्यों, यूट्यूबर-पोर्टल हो रहे नजरअंदाज
समाज की दिशा को तय करना तथा लोगों की आवाज बुलंद करने के लिए वर्तमान में सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकार काफी अच्छा काम करके एक अच्छी मिसाल पैदा कर रहे हैं। हर कोई उनके कार्य से खुश भी हैं, लेकिन, दुख की बात यह है कि बड़े पत्रकार जगत से जुड़ी हस्तियां ही नहीं चाहती है कि ये लोग समाज के आगे आए। ऐसे में उनके अधिकारों की आवाज को दबाया जा रहा हैं। इतनी ही नहीं उनके खिलाफ षडयंत्र रचने में भी ये ताकतें अहम रोल निभा रही हैं। या फिर यू कहें कि इन्हें हर जगह नजरअंदाज किया जा रहा हैं। ऐसे में वक्त की आवाज है कि सोशल मीडिया पत्रकारों को एकजुट होकर आगे आना होगा, और अपने हकों के लिए लड़ना होगा।
इस रिपोर्ट में समझिए, सोशल मीडिया रिपोर्टर में क्या-क्या है अधिकार
सोशल मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि वह हर वो अधिकार हासिल करने के हकदार है जो उन्हें दिए गए हैं। 2 वर्ष से अधिक समय से काम करने वाले को पीला-कार्ड तथा एडिटर इन चीफ पोस्ट वाले को अन्य पत्रकारों की तरह हर प्रकार की सुविधा हासिल करने का पूरा हकर है। अगर कार्य में कोई सरकारी विलंबना डालता है तो उसके खिलाफ कानूनी तौर पर कार्रवाई होना भी लजिमी बनता हैं।
..आखिर में है संघर्ष का रास्ता
इस बार अगर सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकारों की बात को नहीं माना गया तो वे एकसाथ, एकजुट होकर संघर्ष का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे। क्योंकि, उनके सबर का बांध टूट चुका हैं। इसलिए, पहले से ही शहीद भगत सिंह प्रेस जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने फैसला ले लिया कि वह इस बार सोशल मीडिया पत्रकारों के हक के लिए खड़े हैं। चेतावनी देते कहा कि अगर उनकी मांगों को जल्द नहीं माना जाता तो वे भूख हड़ताल पर चले जाएंगे।

