प्रेस क्लब मीटिंग का मैच ‘DPRO-EX-PRESIDENT’ के बीच क्यों था ‘फिक्स’….आखिर, कब तक नजरअंदाज होगा डिजिटल मीडिया….समझेंगे, SNE NEWS EXCLUSIVE रिपोर्ट में…?

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एडिटर-इऩ-चीफ.विनय कोछड़.अमृतसर/CHANDIGARH.

प्रेस क्लब अमृतसर चुनाव में एक बात तो साफ नजर आ रही है कि पूर्व प्रधान तथा लोक निर्माण विभाग के बीच मैच फिक्सिंग हो चुकी है। एक दिन पहले रखी सभी प्रेस यूनियन सहित पत्रकारों को अपने-अपने सुझाव रखने का न्योता एकमात्र औपचारिक था। क्योंकि, प्रिंट मीडिया ग्रुप को ताल्लुक रखने वाले प्रधान साहब तथा डीपीआरओ इंद्रजीत सिंह की एक दिन पहले नियमों-शर्तों की पटकथा लिख दी गई थी। यह तो सिर्फ एक तरह से बनावटी तस्वीरें थी। खैर, डिजिटल मीडिया को इस बार फिर से पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। आवाज रखने की बारी आई तो प्रिंट मीडिया घरानों के पत्रकारों ने विरोध जताकर सच्चाई को दबा लिया। लेकिन, कहते है सच्चाई को कितनी देर तक दबाया जा सकता है आखिर जीत तो हमेशा सच की ही होती है और होती रही हैं। एक बात तो तय है कि जिस प्रकार से डिजिटल मीडिया को ये ताकतें जितना मर्जी दबा लें, लेकिन भविष्य में इनका रास्ता साफ करने में कहीं न कहीं इन लोगों ने बीज बो दिए हैं। 

पंजाब में जब से डिजीटल मीडिया लोगों की आवाज बनकर सामने आई है, तब से सरकार के समक्ष झुकने वाले प्रिंट मीडिया घरानों के पसीने छूटने आरंभ हो चुके है। परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए अब प्रिंट मीडिया भी डिजिटल मीडिया में प्रवेश कर चुकी है। आखिर उन्हें पता लग चुका है कि अगर सुगध सफर तय करना है तो इस रास्ते को अपनाना ही उनके लिए बेहतर विकल्प हैं। प्रतिदिन समाज में दबे-कुचले लोगों के खिलाफ वर्तमान में भी काफी आत्याचार होता हैं, ऐसे में अब उनकी आवाज को दुनिया के समक्ष रखने वाली डिजिटल मीडिया खूब सराहनीय कार्य कर रही है। ऐसे में अख्बारी पत्रकारों को शायद ये बात हजम भी नहीं हो रही है। ऐसा, इसलिए, क्योंकि, उन्हें पहले इन लोगों से खर्च पानी (एंट्री) मिल जाती थी अब वो सब बंद हो चुकी हैं।

प्रेस क्लब में डिजिटल मीडिया की न एंट्री के लिए ,सभी यूनियन प्रधान उतने ही कसूरवार हैं, जितने पूर्व प्रधान, क्योंकि, अंदर खाते सब लोग यहीं चाहते है कि डिजिटल मीडिया इस खेल में कदम नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि ऐसा संभव होता है तो उनका काम फीका पड़ सकता है। वैसे, डिजीटल मीडिया को दिलासा, दावा तो हर वो प्रधान दे रहा है जो इस मैदान में खड़ा है। लेकिन, जो जीत गया, वह सब डिजिटल मीडिया के वादे भूल जाएगा। क्योंकि, इस मुद्दे पर किसी यूनियन की राय एकमत नहीं है। वह तो सिर्फ यह कहते नजर आ रहे है कि आप हमारा सहयोग दें, जीत के उपरांत हम आपका साथ देंगे। आखिर कैसे, मान ले कि आप में जो जीतता है वो हमारी बात को मान लेगे। किसी ने अभी तक अपना मेनिफेस्टो तक नहीं जारी किया कि उनका डिजिटल मीडिया के प्रति क्या स्टेंड है। सभी ख्वाबी पलाओं डिजिटल मीडिया को दिखा रहे हैं। यहां पर मुहावरा यह भी स्टीक बैठता है कि सब अपना-अपना उल्लू-उल्लू सीधा कर रहे हैं। 

अपील-डिजिटल मीडिया एक प्लेटफार्म पर एकत्रित हो

ऐसे में सभी डिजिटल मीडिया से जुड़े जो-जो पत्रकार है, उन सब को एक-दूसरे के साथ विश्वास कर एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा हो जाए। ऐसे में उन सबको लगें कि हमारे बिना इनका जीत पाना इतना आसान नहीं है। उन्हें बता देना चाहिए, अगर हम है तो आप है, वरना आप कुछ नहीं है। लेकिन, ऐसा संभव तभी होगा जब हम सभी एकमत होंगे। ऐसे में लालच तथा एक-दूसरे को तोड़ने के कई हथकंडे अपनाए जाते है, लेकिन, हमे अपने इरादों में अटल होना होगा, ऐसा होने पर दुनिया की कोई ताकत तोड़ नहीं सकती हैं। 

..अगर जरुरत पड़ी तो विरोध का रास्ता भी अपनाने से नहीं रुकना चाहिए

ऐसे में जब हमारी हिम्मत, जुनुनू की बात पर सवाल खड़ा हो जाए तो बिल्कुल ही नहीं पीछे हटना चाहिए। क्योंकि, अब सबकी इज्जत का सवाल खड़ा हो चुका है। वैसे भी कुछ प्रिट मीडिया के पत्रकार चाहते ही नहीं है कि डिजिटल मीडिया उनके समक्ष खड़ी हो, इसलिए, वो कहीं न कहीं हमें तोड़ने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपना रही है। लेकिन, हिम्मत, भाईचारा उनके खिलाफ लड़ने की ताकत देता है। ऐसे में हम सबको एकसाथ एक-दूसरे की आवाज बन कर इकट्ठा होना होगा। तभी जाकर इनको पराजित कर सकेंगे। अगर फिर भी बात न बनें तो हम सबको विरोध का रास्ता भी अपनाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। 

..आखिर डीपीआरओ क्यों आपके रास्ते में अड़चन डाले..बड़ा सवाल

हम सबको एक बात भली भांति जान लेनी चाहिए कि डिजिटल मीडिया भी दुनिया का चौथा स्तंब हैं। ऐसे में हमें किसी प्रकार की कोई भी लोक संपर्क विभाग जैसी सरकारी ताकतों की कोई आवश्यकता है। अगर हम लोग इनकी सरकार की खबर को प्रकाशित या फिर प्रसारित कर , इनकी बात को दुनिया के सामने लाते है तो इनकी भी एक ड्युटी बनती है वे लोग आपकी आवाज को दबाने की बजाय आपके अधिकारों को दिलाए। समझ नहीं आती है कि एक सरकारी अधिकारी ही आपका खुद चुनाव करवाने जा रहा है, ऊपर से शर्ते भी उसके ही मुताबिक चलेंगी। ऐसे में हमारे अंदर अगर जमीर है तो इस प्रकार के चुनाव का तो पहली बात तो यह लड़ना ही नही बनता, अगर लड़ना भी है तो अपनी इच्छा शाक्ति को इतना मजबूत कर दो कि आपके समक्ष आपके मुताबिक, कही हर बात को मान कर चलें। लेकिन, ऐसा होना बिल्कुल असंभव है, क्योंकि, कुछ लोग तो इऩके पिट्ठू बन चुके है। इतना ही नहीं एक-दूसरे के साथ सही-गलत कार्य भी शेयर करते हैं। 

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