SENIOR JOURNALIST VINAY KOCHHAR.चंडीगढ़।
पत्रकार का मौलिक कर्तव्य है कि सच्चाई को दुनिया के समक्ष कलम की आवाज को बुलंद करना होता है। लेकिन, वर्तमान में पुलिस को पत्रकार की कलम शायद चुभने लगी। ताजा मामला, एक काफी वरिष्ठ पत्रकार से जुड़ा है। उसे सरे बाजार में सिपाही ने उस पत्रकार की तेजधार कलम पर धमकी देने का झूठा आरोप लगा दिया तथा साफ तौर पर चेताया कि क्या आप लोग कलम चलाकर विभाग को धमकी देते है। इससे एक बात साफ साबित हो जाती है कि पुलिस विभाग लगता है कि सच्चाई की कलम को दबाना चाहता है तथा तभी ही उन्हें इस बात के लिए बार-बार चेता रहा है। एक प्रकार से यह बात हो जाता है तो साफ साबित हो जाता है कि इस लोकतंत्र में कलम खतरे में है। पता नहीं पुलिस किनके इशारे पर हेकड़ी मचा रही है। क्या उनके पीछे कोई ताकत काम कर रही है या फिर सरकार के इशारे पर यह सब कुछ किया जा रहा है। वैसे भी वर्तमान में पत्रकार की कलम को दबाने का जो तोड़ प्रयास किया जा रहा है। कलम चलाने वालों के खिलाफ किसी न किसी बहाने झूठे पर्चें दर्ज कर जेल में भेजा जा रहा है। इतना ही नहीं, अदालत में भी प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें जल्दी बाहर नहीं आने दिया जाए, इसके लिए वकीलों की बड़ी फौज खड़ी की जा रही है। ऐसे कई मामले सामने आए, जिसमें इन सब बातों का पक्का प्रमाण मिल गया।
हैरान करने वाली बात है कि पंजाब की पत्रकार एसोसिएशन अब तक क्यों चुप बैठी है। इसका क्या मतलब निकाला जा सकता है। क्या , शायद पुलिस के साथ उनकी पक्की दोस्ती हो चुकी है या फिर उनके समक्ष अपना इमान बेच डाला है। विडंबना इस बात की भी है अगर किसी पत्रकार के खिलाफ पुलिस जाती है तो यहीं यूनियन पत्रकार की मदद करने के बजाय, पुलिस का सहयोग बैकफुट पर करती है। कई बार सामने आया कि यह लोग तो साफ कह देते है कि उक्त पत्रकार हमारी साथी ही नहीं। इसका साथ उनका कोई लेना-देना ही नहीं, इसलिए आप लोग जो मर्जी उसके साथ कर सकते है। हालात तो ऐसे पैदा हो चुके है कि 90 फीसद पत्रकारों को रोटी के लाले पड़ चुके है। दायरे उन्हें वेतन तक नहीं दे पाते है। अगर वह खबर प्रकाशित या फिर प्रसारित करने के नाम पर अपना मोहनतनामा लेते है तो कोई बुरी बात भी नहीं है।
प्रेस क्लब या फिर पंजाब की जितनी भी पत्रकार यूनियन है , उनके प्रति एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आज तक उन्होंने पत्रकारों के लिए क्या कुछ किया है। सिर्फ तो सिर्फ अपनी कु्र्सी हासिल करने के अलावा उनके जहन में कुछ करने का सोचा तक नहीं है। बता दें कि पत्रकारों के इतने अधिकार हासिल करने है कि वह लंबे समय से प्रतीक्षा इसी बात के कर रहे है। शायद, उनकी इंतजार की घड़िया थमने नहीं वाली है। क्योंकि, उनके अधिकारों के लिए कोई यूनियन या फिर प्रेस क्लब प्रयास ही नहीं करता है। दायरों के साथ अपनी सेटलमेंट कर लेते है, फिर उनसे मनचाहा फायदा भी लेते है। उन्हें किसी पत्रकार के साथ कोई भी लेना देना ही नहीं है। पत्रकार तो सिर्फ मतदान वाले समय की जरुरत है। तब हाथ जोड़कर उनसे वोट करने के लिए बोला जाता है, बाद में सब लोग मैदान छोड़कर रफूचक्कर हो जाते है।
लंबे समय से सोशल मीडिया से जुड़े उन दायरों को सरकारी मान्यता की चर्चा चल रही है, जिनकी खबर का समाज तथा देश में काफी फर्क पड़ता है। शायद, लगता है कि पुराने दायरे, सरकार तथा प्रेस क्लब से लेकर पत्रकार यूनियन इन्हें आगे बढ़ता देखना नहीं चाहती है, क्योंकि असल में उन्हें अपनी वैल्यू खत्म होने का भयं सता रहा है। अगर वे लोग इस प्रकार की सोच रखते है तो समझ लीजिए, इन्हें अपनी कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार ही नहीं बनता है। यह स्वार्थी सोच को इन लोगों को बदलना होगा। अब तो हर पेशे से जुड़े लोग इस बात की चर्चा करने लग पड़े है कि पत्रकारों की आपस में बनती ही नहीं है, इसलिए इन्हें कभी भी झूठे मामले में फंसाया जा सकता है। यह बात एकदम सच भी है कि क्योंकि, पिछले समय में जितने पत्रकारों के खिलाफ झूठा पर्चा किया गया। उन सब में किसी न किसी पत्रकार का दूसरे पत्रकार को फंसाने में हाथ रहा है।
आरंभिक दौर से ही पत्रकारों की आपसी रंजिश अक्सर देखने को मिलती रही है। मगर तब के दौर में पत्रकार दूसरे पत्रकार के साथ मुश्किल समय में सहानुभूति दिखाता था। लाख दुश्मनियों को दरकिनार दूसरे पत्रकार की मुश्किल में कंधे से कंधा जोड़कर खड़ा हो जाता था। आतंकवाद के काले दौर में यह बातें सामने भी आई। कैसे एक पत्रकार दूसरे पत्रकार की डाल बनकर मुसिबत में खड़े हो जाया करते थे। पिछले एक दशक में पत्रकार शौली में काफी अंतर पाया गया। कोई एक-दूसरे के साथ खड़ा नहीं है। एक दूसरे की लात खींचने में लगा है। मन में यह चल रहा है कि वह किसी प्रकार से उससे आगे न चला जाए। इसका बड़ा कारण यह भी है कि हमारी शैली में कई अशिक्षित लोग घुसपैठ कर चुके है। पत्रकार का शिक्षित होना बहुत जरुर है। क्योंकि, इस पेशे को सफेद श्रेणी का किरदार माना जाता है। नियम की पालना नहीं करने वाले पूर्व में दायरों के खिलाफ उचित कार्रवाई होना चाहिए। क्योंकि, उन्हें पत्रकार की शिक्षा से कुछ लेना देना नहीं है, उन्हें तो सिर्फ तो सिर्फ अपने विज्ञापनों से ही मतलब है। उनकी सोच यह है कि पैसा कहां से आए, चाहे वे रास्ता गलत क्यों नहीं हों। इसके लिए प्रैस कौंसिल आफ इंडिया को भी काफी गंभीर विचार करना होगा। अगर समय रहते कोई उचित कदम नहीं उठाया गया तो शायद यह दुविधा काफी लंबी चली जा सकती है।

